स्टे बैक के नाम पर शिक्षकों से घंटों काम! स्कूल की छुट्टी के बाद भी नहीं मिलती आजादी
बड़े शहरों के नामी-गिरामी निजी स्कूलों की चमक-दमक के पीछे शिक्षकों की कार्यस्थितियों को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। स्कूल की निर्धारित छुट्टी के बाद भी शिक्षकों को रोकना, घर पहुंचने के बाद ऑनलाइन काम देना और शनिवार को बच्चों की छुट्टी के बावजूद शिक्षकों को स्कूल बुलाना—क्या यह शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा है या शिक्षकों पर बढ़ते दबाव की नई तस्वीर?
स्टे बैक कल्चर आज कई शिक्षकों के लिए परेशानी का विषय बनता जा रहा है। शिक्षक सुबह स्कूल पहुंचता है, पूरे दिन कक्षाएं लेता है, कॉपियां जांचता है, रिकॉर्ड तैयार करता है और फिर स्कूल की छुट्टी के बाद भी घंटों रुककर अतिरिक्त काम करता है।
सवाल है—शिक्षक आखिर कब अपने परिवार के साथ समय बिताए?
स्कूल की घंटी बंद, लेकिन शिक्षक की ड्यूटी जारी
स्कूल की छुट्टी की घंटी बजने के बाद बच्चों की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है, लेकिन कई जगह शिक्षकों की ड्यूटी शुरू हो जाती है।
कभी मीटिंग, कभी रिपोर्ट, कभी गतिविधि की तैयारी, कभी रिकॉर्ड अपडेट और कभी अगले दिन की प्लानिंग के नाम पर शिक्षकों को निर्धारित समय के बाद भी रुकना पड़ता है।
यदि यह कभी-कभार की आवश्यकता है तो बात अलग है। लेकिन जब स्टे बैक नियमित व्यवस्था बनने लगे तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि शिक्षक का निर्धारित कार्य समय आखिर है क्या?
घर पहुंचा शिक्षक, फिर मोबाइल पर स्कूल!
स्टे बैक के बाद कहानी खत्म नहीं होती।
घर पहुंचने के बाद भी WhatsApp ग्रुप, ईमेल, ऑनलाइन पोर्टल और अन्य माध्यमों से नए निर्देश आने लगते हैं। कभी रिपोर्ट भेजने को कहा जाता है, कभी डेटा अपडेट करने को और कभी अगले दिन की गतिविधि तैयार करने को।
यानी स्कूल में घंटों रुकने के बाद भी शिक्षक का काम घर तक पहुंच जाता है।
स्कूल से घर तक अगर काम ही काम है, तो शिक्षक का अपना समय आखिर कहां है?
शनिवार बच्चों का अवकाश, शिक्षकों का नहीं?
कई शिक्षकों के बीच यह सवाल भी चर्चा में है कि शनिवार को बच्चों की छुट्टी होने के बावजूद शिक्षकों को मीटिंग, प्रशिक्षण, गतिविधियों या अन्य कार्यों के लिए क्यों बुलाया जाता है।
काम की जरूरत हो सकती है, लेकिन सप्ताहांत की ड्यूटी यदि लगातार बढ़ती जाए तो इसका असर शिक्षक के निजी जीवन पर पड़ना स्वाभाविक है।
शिक्षक भी परिवार का हिस्सा है। उसे भी आराम चाहिए, व्यक्तिगत समय चाहिए और मानसिक शांति चाहिए।
शिक्षक मशीन नहीं, इंसान है
शिक्षा व्यवस्था में अनुशासन जरूरी है। स्कूल के काम के प्रति जिम्मेदारी भी जरूरी है। लेकिन जिम्मेदारी और लगातार दबाव के बीच एक स्पष्ट सीमा होनी चाहिए।
शिक्षक से बेहतर परिणाम की उम्मीद की जाती है। लेकिन बेहतर परिणाम के लिए उसे बेहतर कार्य वातावरण भी देना होगा।
थका हुआ शिक्षक बेहतर शिक्षा कैसे देगा?
सरकार को अब शिक्षकों की कार्यस्थितियों पर भी नजर डालनी चाहिए
शिक्षा विभाग और सरकार को निजी स्कूलों में शिक्षकों के कार्य-घंटों, स्टे बैक, स्कूल समय के बाद ऑनलाइन काम, सप्ताहांत की ड्यूटी और मूलभूत सुविधाओं को लेकर स्पष्ट व्यवस्था और प्रभावी निगरानी पर ध्यान देना चाहिए।
शिक्षकों को अपनी समस्या रखने के लिए ऐसी शिकायत व्यवस्था भी मिलनी चाहिए, जहां वे बिना नौकरी या प्रताड़ना के डर के अपनी बात रख सकें।
स्कूल की पहचान सिर्फ रिजल्ट और चमकदार कैंपस से नहीं होती
किसी स्कूल की असली ताकत उसकी इमारत नहीं, उसके शिक्षक होते हैं।
अगर वही शिक्षक लगातार दबाव में रहेंगे, उनका निजी समय खत्म होता जाएगा और उन्हें हर समय उपलब्ध रहने की अपेक्षा की जाएगी, तो इसका असर अंततः शिक्षा की गुणवत्ता पर भी पड़ सकता है।
अब सवाल सिर्फ स्कूल प्रबंधन से नहीं, सरकार से भी है—
क्या शिक्षकों के लिए भी ‘वर्किंग ऑवर’ और ‘पर्सनल टाइम’ की स्पष्ट सीमा तय नहीं होनी चाहिए?
सत्यधारा 24 का सवाल:
बच्चों की छुट्टी हो गई, स्कूल की छुट्टी हो गई, लेकिन अगर शिक्षक की ड्यूटी खत्म नहीं होती—तो आखिर यह शिक्षा है या शिक्षकों पर बढ़ता कार्यभार?
