सत्यधारा 24 | विशेष रिपोर्ट | बस्तर
बस्तर के जंगलों की कहानी सिर्फ पेड़ों, पहाड़ों और वन्यजीवों तक सीमित नहीं है। इसमें एक ऐसा नाम भी दर्ज है, जिसने महज बचपन में दुनिया का ध्यान बस्तर की ओर खींच दिया था—चेंदरू मंडावी।
18 सितंबर 2013 को 78 वर्ष की उम्र में चेंदरू का निधन हुआ था। आज उनकी 13वीं पुण्यतिथि पर उनकी कहानी इसलिए फिर चर्चा में है, क्योंकि इंद्रावती टाइगर रिजर्व एक नए दौर में प्रवेश करने की तैयारी में है। करीब चार दशक बाद यहां 1 नवंबर 2026 से वन्यजीव पर्यटन शुरू करने की तैयारी है।
कौन थे चेंदरू मंडावी?
नारायणपुर क्षेत्र के गढ़बेंगाल गांव के मुरिया आदिवासी परिवार से आने वाले चेंदरू का बचपन जंगल और वन्यजीवन के बीच बीता। यही जुड़ाव उन्हें स्वीडिश फिल्मकार अरने सुक्सडॉर्फ की फिल्म En Djungelsaga तक ले गया।
1957 में बनी यह फिल्म अंग्रेजी में The Flute and the Arrow के नाम से भी जानी जाती है। इसमें बस्तर के आदिवासी जीवन और जंगल की दुनिया को केंद्र में रखा गया था। फिल्म को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली और 1958 में यह कान फिल्म समारोह की प्रतियोगिता में शामिल हुई।
चेंदरू की तस्वीर और कहानी यूरोप तक पहुंची और वह बस्तर से निकलकर अंतरराष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बन गए।
‘टाइगर बॉय’ की कहानी कितनी सच?
चेंदरू की पहचान का सबसे चर्चित हिस्सा बाघ ‘टेंबू’ के साथ उनकी दोस्ती की कहानी रही है। लंबे समय तक यह किस्सा बताया जाता रहा कि चेंदरू और टेंबू साथ रहते और खेलते थे।
हालांकि इस कहानी को लेकर सवाल भी उठे। 2016 में वन्यजीव कार्यकर्ता नितिन सिंघवी ने चेंदरू से जुड़े पुराने इंटरव्यू के आधार पर कहानी के तथ्यों की दोबारा जांच की मांग की थी। उनके अनुसार चेंदरू ने 1996 के एक इंटरव्यू में बताया था कि फिल्म में इस्तेमाल बाघ फिल्म यूनिट द्वारा लाया गया था।
इसलिए चेंदरू और बाघ की दोस्ती को आज निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य के रूप में पेश करने के बजाय इसे उनकी लोकप्रिय कहानी के हिस्से के रूप में देखना अधिक उचित है।
अंतरराष्ट्रीय पहचान से गांव की जिंदगी तक
फिल्म की सफलता के बाद चेंदरू स्वीडन भी गए। लेकिन कम उम्र में मिली अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि उनकी पूरी जिंदगी की कहानी नहीं बन सकी। वे वापस बस्तर लौटे और बाद का जीवन सामान्य परिस्थितियों में बिताया।
18 सितंबर 2013 को बीमारी के बाद गढ़बेंगाल में उनका निधन हुआ। जिस बालक की कहानी कभी यूरोप तक पहुंची थी, उसके जीवन का अंतिम अध्याय उसी बस्तर की धरती पर लिखा गया, जहां से उसकी कहानी शुरू हुई थी।
चेंदरू और इंद्रावती की नई कहानी
आज चेंदरू की पुण्यतिथि पर इंद्रावती टाइगर रिजर्व का जिक्र इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनकी पहचान बस्तर के जंगल और वन्यजीवन से बनी थी।
इंद्रावती टाइगर रिजर्व का कुल क्षेत्रफल 2,799.07 वर्ग किलोमीटर है। इसमें 1,258.37 वर्ग किलोमीटर कोर क्षेत्र और 1,540.70 वर्ग किलोमीटर बफर क्षेत्र शामिल है। यहां बाघों के साथ जंगली भैंसा, तेंदुआ, भालू, जंगली कुत्ता, गौर, सांभर और चीतल जैसे वन्यजीव पाए जाते हैं।
अब करीब चार दशक बाद यहां पर्यटन शुरू करने की तैयारी है। शुरुआती चरण में कुछ पर्यटन स्थलों और सफारी रूट विकसित किए जाने की योजना है।
पर्यटन के साथ संरक्षण की चुनौती
इंद्रावती में पर्यटन की शुरुआत केवल पर्यटकों को जंगल दिखाने तक सीमित नहीं होगी। इसके साथ कई महत्वपूर्ण सवाल भी जुड़े हैं—
- जंगल और जैव विविधता की सुरक्षा कैसे होगी?
- वन्यजीवों पर पर्यटन का दबाव कैसे नियंत्रित किया जाएगा?
- स्थानीय आदिवासी समुदाय को पर्यटन से किस तरह जोड़ा जाएगा?
- स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और आजीविका के अवसर कैसे बढ़ेंगे?
- क्या चेंदरू जैसे स्थानीय इतिहास और संस्कृति को पर्यटन की कहानी का हिस्सा बनाया जाएगा?
यही सवाल इंद्रावती के नए पर्यटन अध्याय को खास बनाते हैं।
चेंदरू की विरासत का असली अर्थ
चेंदरू सिर्फ एक फिल्म का चेहरा नहीं थे। उनकी कहानी बस्तर की आदिवासी संस्कृति, जंगल और वन्यजीवन को एक साथ जोड़ती है।
उन्होंने एक दौर में दुनिया को बस्तर की झलक दिखाई थी। अब इंद्रावती में पर्यटन का नया अध्याय शुरू होने जा रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि दुनिया को जंगल दिखाने के साथ-साथ उस जंगल को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित कैसे रखा जाए।
चेंदरू आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कहानी अब भी बस्तर के जंगलों को दुनिया से जोड़ती है।
और शायद यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है—
“बाघ बचाएं, जंगल बचाएं, भविष्य बचाएं।”
तथ्य-जांच
चेंदरू से जुड़ी फिल्म को कई जगह “ऑस्कर विजेता फिल्म” बताया गया है। उपलब्ध अभिलेखीय जानकारी के अनुसार En Djungelsaga / The Flute and the Arrow को कान से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली थी। अरने सुक्सडॉर्फ की ऑस्कर विजेता कृति Människor i stad (Symphony of a City) अलग फिल्म थी। इसलिए चेंदरू की फिल्म को सीधे “ऑस्कर विजेता” कहना सही नहीं होगा।
