पुतिन से मुलाकात के बाद अब शी जिनपिंग आमने-सामने, युद्ध, व्यापार और नई वैश्विक व्यवस्था पर टिकी निगाहें
नई दिल्ली। | सत्यधारा 24
दिल्ली में BRICS 2026 का मंच सज चुका है, लेकिन इस बार यह सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन नहीं है। दुनिया की नजरें भारत पर हैं और सबसे ज्यादा इंतजार उस मुलाकात का है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग आमने-सामने होंगे।
शी जिनपिंग शनिवार को नई दिल्ली पहुंच चुके हैं। यह सात साल बाद उनका भारत दौरा है। BRICS सम्मेलन के दौरान मोदी और शी की बैठक ऐसे समय हो रही है, जब दोनों देशों के रिश्ते सीमा विवाद और 2020 के गलवान संघर्ष के बाद धीरे-धीरे सामान्य होने की कोशिश कर रहे हैं।
पुतिन से मुलाकात के बाद शी की बारी
BRICS सम्मेलन से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से अहम द्विपक्षीय बातचीत की। दोनों नेताओं ने व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, उर्वरक और दूसरे रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की।
भारत और रूस ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक ले जाने की दिशा में रोडमैप पर भी चर्चा की है।
यानी एक ही मंच पर भारत के सामने रूस और चीन—दोनों बड़े रणनीतिक साझेदार हैं। यही वजह है कि BRICS 2026 भारत की कूटनीतिक रणनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मोदी-शी बैठक पर क्यों है दुनिया की नजर?
शी जिनपिंग के भारत पहुंचते ही सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या मोदी और शी के बीच सिर्फ BRICS की बातचीत होगी या रिश्तों की नई शुरुआत का कोई संकेत भी मिलेगा?
दोनों देशों के बीच सीमा तनाव, व्यापार असंतुलन और सुरक्षा संबंधी चिंताएं लंबे समय से चुनौती बनी हुई हैं। हालांकि हाल के महीनों में दोनों पक्षों के बीच संवाद बढ़ा है।
चीन ने भी भारत के साथ मतभेदों को उचित तरीके से संभालने और संबंधों को दीर्घकालिक नजरिए से आगे बढ़ाने की इच्छा जताई है।
BRICS का असली एजेंडा क्या है?
भारत की अध्यक्षता में 2026 BRICS का फोकस Resilience, Innovation, Cooperation और Sustainability पर रखा गया है। भारत विकास, तकनीक, वित्त, व्यापार और लोगों के बीच संपर्क को प्रमुख एजेंडे में रख रहा है।
BRICS के भीतर एक बड़ा मुद्दा वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में सुधार का भी है। सदस्य देश IMF और World Bank जैसी संस्थाओं में विकासशील देशों की भूमिका और प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग कर रहे हैं।
इसके साथ ही स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, सीमा-पार भुगतान को आसान बनाने और पश्चिमी वित्तीय प्रणालियों पर निर्भरता घटाने जैसे मुद्दे भी चर्चा के केंद्र में हैं।
अमेरिका और पश्चिम के लिए भी बड़ा संदेश?
BRICS का विस्तार इसे पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा प्रभावशाली समूह बना चुका है। अब इसमें एशिया, अफ्रीका और मध्य-पूर्व की कई बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं।
रूस और चीन BRICS को पश्चिमी प्रभुत्व के विकल्प के रूप में ज्यादा मजबूत भूमिका देने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं भारत की रणनीति अपेक्षाकृत संतुलित है—रूस के साथ रणनीतिक संबंध, चीन के साथ संवाद और अमेरिका-यूरोप के साथ भी मजबूत रिश्ते।
यही भारत की BRICS कूटनीति को सबसे अलग बनाता है।
युद्धों के बीच BRICS की परीक्षा
इस बार सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब दुनिया यूक्रेन युद्ध और मध्य-पूर्व के संघर्षों से जूझ रही है। इन मुद्दों पर BRICS देशों के बीच पूरी तरह एक जैसी राय नहीं है।
यही वजह है कि सम्मेलन के दौरान किसी साझा बयान या घोषणा पर सहमति बनाना भी चुनौती हो सकता है।
भारत की कोशिश है कि BRICS को किसी एक देश या किसी एक धड़े के खिलाफ मंच बनाने के बजाय विकासशील देशों की आवाज और वैश्विक शासन सुधार के प्रभावी मंच के रूप में आगे बढ़ाया जाए।
असली सवाल अब यही है…
क्या दिल्ली से BRICS की नई दिशा तय होगी?
क्या मोदी-शी मुलाकात भारत-चीन संबंधों में नया अध्याय खोलेगी?
क्या रूस के साथ भारत का आर्थिक रिश्ता और मजबूत होगा?
और क्या BRICS पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था के सामने एक मजबूत वैकल्पिक ढांचा खड़ा करने की दिशा में आगे बढ़ेगा?
इन सवालों के जवाब आने वाले दो दिनों में सामने आने वाले फैसलों और घोषणाओं से मिलेंगे।
फिलहाल इतना तय है—BRICS 2026 की मेज पर सिर्फ 11 देशों के नेता नहीं बैठे हैं, बल्कि बदलती हुई वैश्विक व्यवस्था का अगला खाका भी तैयार हो रहा है।
सत्यधारा 24 | विशेष रिपोर्ट
