पुतिन आज पहुंचे, जिनपिंग कल आएंगे—BRICS की मेज पर सिर्फ बैठक नहीं, बदलती वैश्विक राजनीति का संकेत
सत्यधारा 24 | विशेष रिपोर्ट
नई दिल्ली। दिल्ली इस वक्त सिर्फ किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की मेजबानी नहीं कर रही, बल्कि दुनिया की बदलती कूटनीतिक तस्वीर का एक बड़ा मंच बन चुकी है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन शुक्रवार को भारत पहुंच चुके हैं, जबकि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 12 सितंबर को दिल्ली पहुंचेंगे। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ दुनिया की तीन बड़ी शक्तियों के शीर्ष नेताओं की मौजूदगी BRICS को एक साधारण शिखर सम्मेलन से कहीं बड़ा राजनीतिक मंच बना देती है।

सवाल यह नहीं कि कौन आया… सवाल यह है कि दिल्ली से क्या संदेश जाएगा?
पुतिन की भारत यात्रा ऐसे समय हो रही है जब वैश्विक राजनीति में रूस-पश्चिम तनाव, यूक्रेन संघर्ष, ऊर्जा सुरक्षा और बदलते व्यापारिक समीकरण लगातार दबाव बना रहे हैं। वहीं जिनपिंग का भारत दौरा सात साल बाद हो रहा है और गलवान के बाद भारत-चीन संबंधों में आई दूरी के बीच उनकी मोदी से संभावित मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजर है।
यानी दिल्ली में होने वाली मुलाकातों का असर सिर्फ भारत-रूस या भारत-चीन संबंधों तक सीमित नहीं रहेगा।
मोदी की सबसे बड़ी कूटनीतिक परीक्षा
भारत के सामने सबसे बड़ा अवसर यही है कि वह रूस और चीन दोनों के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को संभालते हुए अपनी स्वतंत्र विदेश नीति की ताकत दिखाए।
एक तरफ मॉस्को है, दूसरी तरफ बीजिंग और तीसरी तरफ पश्चिमी दुनिया।
ऐसे माहौल में मोदी के लिए चुनौती केवल रिश्ते मजबूत करने की नहीं, बल्कि यह संदेश देने की भी है कि भारत किसी एक शक्ति-गुट का हिस्सा नहीं, बल्कि अपने हितों के आधार पर दुनिया के अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ संवाद करने वाला स्वतंत्र ध्रुव है।
पुतिन से क्या निकलेगा?
मोदी-पुतिन बातचीत में व्यापार, ऊर्जा, रक्षा और रणनीतिक सहयोग प्रमुख विषयों में रह सकते हैं। रूस-भारत संबंधों में भुगतान व्यवस्था, ऊर्जा सहयोग और रक्षा क्षेत्र लंबे समय से महत्वपूर्ण मुद्दे रहे हैं।
लेकिन असली सवाल यह होगा कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भारत और रूस अपनी पुरानी दोस्ती को नए आर्थिक और रणनीतिक ढांचे में कितना आगे ले जाते हैं।
जिनपिंग की एंट्री क्यों सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण?
शी जिनपिंग की यात्रा इस पूरे घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील हिस्सा है। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत-चीन संबंधों में लंबे समय तक तनाव रहा है। हाल के समय में कुछ क्षेत्रों में रिश्तों में नरमी के संकेत जरूर मिले हैं, लेकिन सीमा, व्यापार, निवेश और रणनीतिक विश्वास जैसे मुद्दे अभी भी पूरी तरह हल नहीं हुए हैं।
इसलिए मोदी-जिनपिंग मुलाकात अगर होती है, तो उसकी तस्वीर और बातचीत दोनों ही अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिए बड़ा संदेश बन सकती हैं।
BRICS की मेज पर भारत की कुर्सी सबसे अहम क्यों?
12-13 सितंबर को दिल्ली में होने वाली 18वीं BRICS शिखर बैठक में 11 सदस्य देश शामिल होंगे। संगठन अब वैश्विक अर्थव्यवस्था और ग्लोबल साउथ की राजनीति में पहले से कहीं अधिक बड़ा मंच बन चुका है।
लेकिन इस बार BRICS की सबसे दिलचस्प तस्वीर शायद किसी प्रस्ताव या घोषणा में नहीं, बल्कि मोदी-पुतिन-जिनपिंग की एक ही मंच पर मौजूदगी में दिखाई देगी।
असली कहानी यही है…
दिल्ली में मेहमान सिर्फ तीन राष्ट्राध्यक्ष नहीं हैं।
उनके साथ तीन अलग-अलग वैश्विक दृष्टिकोण भी भारत की मेज पर आ रहे हैं—
रूस की रणनीतिक साझेदारी, चीन की बढ़ती वैश्विक महत्वाकांक्षा और भारत की स्वतंत्र कूटनीतिक राह।
अब देखना यह है कि BRICS की इस मेज से दुनिया को सिर्फ एक तस्वीर मिलती है या नए शक्ति-संतुलन की दिशा भी तय होती है।
