8.386 हेक्टेयर वन भूमि डायवर्जन को प्रथम चरण की सैद्धांतिक मंजूरी; अब केंद्र की द्वितीय चरण की स्वीकृति का इंतजार

रायपुर/बस्तर। बस्तर की सड़क कनेक्टिविटी को मजबूत करने वाली महत्वपूर्ण परियोजना अब निर्णायक चरण में पहुंच गई है। कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र से गुजरने वाले NH-30 के 6.010 किलोमीटर हिस्से के चौड़ीकरण और मजबूतीकरण का रास्ता आगे बढ़ गया है। परियोजना के लिए 8.386 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन को प्रथम चरण की सशर्त सैद्धांतिक स्वीकृति पहले ही मिल चुकी है।

अब निर्धारित शर्तों के अनुपालन के बाद परियोजना की द्वितीय चरण की अंतिम वन स्वीकृति के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा गया है। अंतिम मंजूरी मिलने के बाद सड़क के चौड़ीकरण और मजबूतीकरण का काम आगे बढ़ सकेगा।

जगदलपुर–सुकमा–कोंटा मार्ग के लिए अहम परियोजना

यह परियोजना जगदलपुर–सुकमा–कोंटा मार्ग के अंतर्गत NH-30 के किलोमीटर 25.530 से 31.540 तक के हिस्से से जुड़ी है। इस सड़क के उन्नयन से बस्तर के दक्षिणी हिस्से में आवागमन को अधिक सुरक्षित और सुगम बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

जगदलपुर से सुकमा और कोंटा की ओर जाने वाले इस महत्वपूर्ण मार्ग की स्थिति बेहतर होने से स्थानीय नागरिकों के साथ-साथ यात्रियों, व्यापारिक गतिविधियों और प्रशासनिक आवागमन को भी लाभ मिल सकता है।

वन मंत्री की पहल से प्रक्रिया में आई तेजी

वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप की पहल के बाद विभागीय स्तर पर परियोजना से जुड़ी स्वीकृति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार के साथ समन्वय किया गया।

भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के क्षेत्रीय कार्यालय, नागपुर ने 13 अक्टूबर 2025 को परियोजना को प्रथम चरण की सशर्त सैद्धांतिक स्वीकृति दी थी। इसके बाद स्वीकृति में निर्धारित वन एवं पर्यावरण संबंधी शर्तों को पूरा करने की कार्रवाई की गई।

23 जून 2026 को प्रभारी अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (भू-प्रबंध) ने शर्तों के अनुपालन से संबंधित प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। इसके बाद 8 जुलाई 2026 को छत्तीसगढ़ शासन के वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने केंद्र सरकार के नवा रायपुर स्थित उप कार्यालय को द्वितीय चरण की स्वीकृति के लिए पत्र भेजा।

इसके बाद 10 जुलाई 2026 को प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख, छत्तीसगढ़ के कार्यालय से भी आवश्यक कार्रवाई आगे बढ़ाई गई।

क्षतिपूरक वनीकरण की राशि भी जमा

परियोजना के लिए वन भूमि के उपयोग के बदले निर्धारित क्षतिपूरक वनीकरण और अतिरिक्त क्षतिपूरक वनीकरण की राशि वित्तीय वर्ष 2025-26 की निर्धारित दर के अनुसार जमा की जा चुकी है।

अंतिम स्वीकृति के दौरान राशि में कोई अंतर आने पर उसे प्रचलित दर के अनुसार जमा करने का प्रावधान भी रखा गया है।

हालांकि अंतिम वन स्वीकृति से पहले कुछ अनुमत प्रारंभिक तैयारियां की जा सकती हैं, लेकिन ब्लैक टॉपिंग समेत सड़क को स्थायी स्वरूप देने वाले कार्य अंतिम स्वीकृति के बाद ही किए जा सकेंगे।

विकास के साथ कांगेर घाटी का संरक्षण भी चुनौती

कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान बस्तर की प्राकृतिक संपदा और जैव-विविधता का महत्वपूर्ण केंद्र है। ऐसे में NH-30 का विस्तार केवल सड़क निर्माण की परियोजना नहीं, बल्कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की भी परीक्षा है।

राज्य सरकार का कहना है कि परियोजना में वन, वन्यजीव और पर्यावरण से जुड़े सभी वैधानिक प्रावधानों का पालन प्राथमिकता के साथ किया जा रहा है।

बेहतर सड़क संपर्क से कांगेर घाटी और आसपास के क्षेत्रों में पर्यटन, स्थानीय व्यापार तथा प्रशासनिक पहुंच को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।

“बस्तर की कनेक्टिविटी मजबूत करना प्राथमिकता”

वन मंत्री केदार कश्यप ने कहा कि बस्तर के समग्र विकास में बेहतर सड़क संपर्क की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने कहा कि NH-30 के संबंधित हिस्से के चौड़ीकरण और मजबूतीकरण की प्रक्रिया सभी वैधानिक एवं पर्यावरणीय प्रावधानों का पालन करते हुए आगे बढ़ाई जा रही है।

उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में सरकार बस्तर की विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए केंद्र और राज्य के बीच बेहतर समन्वय के साथ काम कर रही है।

कश्यप के मुताबिक बेहतर सड़कें केवल आवागमन आसान नहीं करतीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन, व्यापार और रोजगार के अवसरों तक पहुंच भी बेहतर बनाती हैं।

अब अंतिम मंजूरी पर टिकी नजर

प्रथम चरण की शर्तों का अनुपालन पूरा होने के बाद द्वितीय चरण की स्वीकृति के लिए प्रस्ताव भेजा जा चुका है। अब परियोजना की अगली बड़ी कड़ी केंद्र सरकार की अंतिम वन स्वीकृति है।

स्वीकृति मिलने के बाद NH-30 के इस 6.010 किलोमीटर हिस्से के चौड़ीकरण और मजबूतीकरण का काम पूरी तरह आगे बढ़ सकेगा। इससे बस्तर के दक्षिणी हिस्से की कनेक्टिविटी को मजबूती मिलने के साथ कांगेर घाटी क्षेत्र में सुरक्षित और सुगम आवागमन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

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