चार बेटों के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होने की खबर ने खड़े किए रिश्तों और संपत्ति के सवाल
सत्यधारा 24 | विशेष रिपोर्ट
जिस मां ने बच्चों के भविष्य के लिए अपने जेवर तक बेच दिए, उसी मां की मौत के बाद अगर उसके अंतिम संस्कार के लिए भी परिवार का साथ न मिले, तो सवाल सिर्फ एक परिवार तक सीमित नहीं रहता। यह घटना रिश्तों, जिम्मेदारी और बदलती सामाजिक सोच पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, एक बुजुर्ग महिला की मौत के बाद उसके चारों बेटे अंतिम संस्कार के लिए नहीं पहुंचे। बताया गया कि इस वजह से करीब तीन दिन तक अंतिम संस्कार नहीं हो सका। मामले में यह आरोप भी सामने आया कि महिला ने अपने जेवर बेचकर जिस फ्लैट को खरीदा था, बाद में उस संपत्ति पर बेटों का कब्जा हो गया।
हालांकि इन आरोपों की कानूनी स्थिति और पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र पुष्टि अलग विषय है, लेकिन घटना से जुड़ी खबर ने एक बड़ा सामाजिक सवाल जरूर खड़ा किया है।
जेवर बेचकर बनाया घर, लेकिन मां के हिस्से में क्या आया?
मां-बाप अक्सर बच्चों के भविष्य के लिए अपनी इच्छाएं और सुविधाएं छोड़ देते हैं। जरूरत पड़ने पर बचत खत्म करते हैं, गहने बेचते हैं और अपने बच्चों के लिए घर तक बनाते हैं।
लेकिन जब जीवन के अंतिम पड़ाव पर वही माता-पिता अकेले पड़ जाएं, तो सवाल सिर्फ आर्थिक मदद का नहीं होता—सवाल रिश्ते की जिम्मेदारी का भी होता है।
अगर सामने आई जानकारी सही है, तो सबसे पीड़ादायक पहलू यही है कि जिस मां ने अपने बच्चों के भविष्य के लिए अपनी संपत्ति और इच्छाओं का त्याग किया, उसे अंतिम यात्रा में अपनों का साथ तक नहीं मिला।
क्या रिश्ते भी संपत्ति से तौले जाने लगे हैं?
फ्लैट, जमीन, पैसा और विरासत—इनका कानूनी बंटवारा हो सकता है। लेकिन मां-बाप के साथ बिताया समय और उनका स्नेह किसी दस्तावेज में दर्ज नहीं किया जा सकता।
ऐसे मामले समाज के सामने यह सवाल रखते हैं कि क्या कुछ परिवारों में रिश्तों की मजबूती भी संपत्ति और आर्थिक हितों से प्रभावित होने लगी है?
हर परिवार की परिस्थितियां अलग होती हैं और किसी एक घटना के आधार पर पूरे समाज पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन माता-पिता की मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार जैसे अवसर पर परिवार की गैरमौजूदगी की खबर निश्चित रूप से संवेदनशील सवाल पैदा करती है।
संपत्ति वापस मिल सकती है, मां नहीं
घर दोबारा बनाया जा सकता है। पैसा फिर कमाया जा सकता है। जमीन और संपत्ति का कानूनी बंटवारा भी हो सकता है।
लेकिन मां के साथ बिताया गया समय वापस नहीं आता।
जिस घर को बनाने के लिए किसी मां ने अपने गहने बेच दिए हों, उस घर की कीमत सिर्फ उसकी दीवारों और कागजों से नहीं तय होती। उसके पीछे उस मां का जीवन, त्याग और उम्मीदें भी जुड़ी होती हैं।
मां-बाप की जरूरत सिर्फ तब नहीं होती, जब संपत्ति उनके नाम हो या उनसे कोई आर्थिक लाभ जुड़ा हो। उनका सबसे बड़ा अधिकार सम्मान और अपनापन है।
इस घटना की पूरी सच्चाई जांच और उपलब्ध तथ्यों से ही सामने आ सकती है। लेकिन इससे उठने वाला सवाल बेहद सीधा है—
क्या हम अपने माता-पिता की कीमत उनके जीते-जी समझ रहे हैं, या उनकी संपत्ति की कीमत उनसे ज्यादा समझने लगे हैं?
क्योंकि विरासत कागजों पर मिल सकती है, लेकिन मां का साथ और आशीर्वाद दोबारा नहीं मिलता।
