राष्ट्रीय राजनीति के बड़े चेहरे को छत्तीसगढ़ की कमान, सिद्धार्थ शंभू सह-प्रभारी; सरकार से ज्यादा अब संगठन की कार्यशैली पर रहेगी नजर
विशेष राजनीतिक विश्लेषण | सत्यधारा 24
रायपुर।छत्तीसगढ़ भाजपा में बुधवार को एक ऐसा संगठनात्मक फैसला हुआ, जिसने प्रदेश की सियासत में नई चर्चा छेड़ दी है।
छत्तीसगढ़ भाजपा में बुधवार को एक ऐसा संगठनात्मक फैसला हुआ, जिसने प्रदेश की सियासत में नई चर्चा छेड़ दी है।
भाजपा ने पूर्व केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय महामंत्री स्मृति ईरानी को छत्तीसगढ़ का प्रदेश प्रभारी नियुक्त किया है। उनके साथ सिद्धार्थ शंभू को सह-प्रभारी बनाया गया है। यह फैसला भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की ओर से किए गए व्यापक संगठनात्मक फेरबदल का हिस्सा है। स्मृति ईरानी को छत्तीसगढ़ के साथ हरियाणा की भी जिम्मेदारी दी गई है।
नितिन नबीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद छत्तीसगढ़ का प्रदेश प्रभारी पद खाली था। अब इस खाली जगह को जिस चेहरे से भरा गया है, वही इस नियुक्ति को राजनीतिक रूप से चर्चा में ला रहा है।
सवाल सीधा है—भाजपा ने छत्तीसगढ़ के लिए स्मृति ईरानी को ही क्यों चुना?
इसका आधिकारिक कारण पार्टी ने विस्तार से नहीं बताया है। इसलिए इसके पीछे किसी एक निश्चित राजनीतिक मकसद का दावा करना जल्दबाजी होगा। लेकिन इस नियुक्ति के संभावित संगठनात्मक और राजनीतिक असर पर नजर डालना जरूरी है।
दिल्ली का चेहरा, छत्तीसगढ़ की जमीन
स्मृति ईरानी राष्ट्रीय राजनीति का जाना-पहचाना चेहरा हैं।
लेकिन छत्तीसगढ़ की राजनीति का अपना अलग चरित्र है।
यहां बस्तर से लेकर सरगुजा तक राजनीतिक समीकरण अलग हैं। आदिवासी इलाकों के सवाल अलग हैं। किसान, धान, रोजगार, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों का विकास, कानून-व्यवस्था, सरकारी योजनाओं का असर और स्थानीय नेतृत्व—ये ऐसे मुद्दे हैं जिनका जवाब राष्ट्रीय राजनीतिक भाषणों से नहीं, बल्कि जमीन पर संगठन की मौजूदगी से मिलता है।
यही स्मृति ईरानी की पहली बड़ी परीक्षा हो सकती है।
राष्ट्रीय पहचान को स्थानीय राजनीतिक भाषा में बदलना।
भाजपा सत्ता में है, इसलिए चुनौती भी अलग है
छत्तीसगढ़ में भाजपा विपक्ष में नहीं, सरकार में है।
ऐसे में प्रदेश प्रभारी की चुनौती सरकार बनाना नहीं, बल्कि सरकार और संगठन के बीच राजनीतिक तालमेल को मजबूत रखना है।
प्रदेश प्रभारी की जिम्मेदारियों में केंद्रीय नेतृत्व और प्रदेश संगठन के बीच समन्वय, संगठनात्मक गतिविधियों की समीक्षा और पार्टी कार्यक्रमों को आगे बढ़ाना शामिल होता है।
यानी अब नजर इस पर रहेगी कि—
सरकार की उपलब्धियों की राजनीतिक पहुंच कितनी बढ़ती है?
कार्यकर्ताओं की आवाज ऊपर तक कितनी तेजी से पहुंचती है?
जिला और मंडल संगठन कितने सक्रिय होते हैं?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या संगठन और सरकार के बीच फीडबैक का तंत्र और मजबूत होता है?
कांग्रेस के सामने भी बदलेगा राजनीतिक मैदान?
स्मृति ईरानी की नियुक्ति के बाद कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक संवाद की शैली पर भी नजर रहेगी।
हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगा कि प्रदेश भाजपा की रणनीति में कोई निश्चित बदलाव होने जा रहा है।
लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय नेता के प्रदेश प्रभारी बनने से विपक्ष के साथ राजनीतिक जवाबदेही और मीडिया नैरेटिव पर अधिक ध्यान दिए जाने की संभावना पर चर्चा स्वाभाविक है।
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के लिए इसका अर्थ यह हो सकता है कि सरकार पर हमलों के साथ-साथ भाजपा संगठन की प्रतिक्रिया को भी राजनीतिक मुकाबले का हिस्सा बनाना पड़े।
लेकिन यहां भी असली सवाल बयानबाजी का नहीं है।
सवाल है—कौन जनता के स्थानीय मुद्दों को ज्यादा प्रभावी तरीके से राजनीतिक मुद्दे में बदल पाता है?
संगठन की असली परीक्षा बूथ पर होगी
किसी भी पार्टी के लिए प्रदेश प्रभारी की सफलता का पैमाना सिर्फ बड़ी बैठकें या बड़े मंच नहीं होते।
असली परीक्षा नीचे होती है—
बूथ पर।
मंडल में।
जिले में।
कार्यकर्ताओं के बीच।
अगर नई टीम नियमित रूप से जमीनी फीडबैक लेती है, संगठनात्मक कमजोरियों को पहचानती है और स्थानीय नेतृत्व के साथ तालमेल बनाती है, तभी इस नियुक्ति का वास्तविक प्रभाव दिखाई देगा।
वरना राष्ट्रीय चेहरा होने भर से संगठन मजबूत नहीं होता।
संगठन भाषण से नहीं, लगातार जमीन पर काम करने से मजबूत होता है।
2028 दूर है, लेकिन तैयारी आज से
2028 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है।
फिर भी राजनीतिक दल चुनावी संगठन की तैयारी मतदान से काफी पहले शुरू करते हैं।
इसलिए स्मृति ईरानी की नियुक्ति को सीधे 2028 की रणनीति घोषित करना उचित नहीं होगा, लेकिन आने वाले समय में भाजपा का बूथ नेटवर्क, कार्यकर्ता संपर्क, सामाजिक समूहों तक पहुंच और सरकार की उपलब्धियों का राजनीतिक संचार—इन सब पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि 23 सितंबर को भाजपा ने 28 राज्यों और 8 केंद्रशासित प्रदेशों के लिए प्रभारी और सह-प्रभारियों की नई व्यवस्था घोषित की है। यानी छत्तीसगढ़ में हुआ बदलाव व्यापक राष्ट्रीय संगठनात्मक फेरबदल का हिस्सा है।
स्मृति ईरानी के सामने चार बड़े सवाल
पहला—क्या संगठन और सरकार के बीच समन्वय और मजबूत होगा?
दूसरा—क्या जिला और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से फीडबैक लेने की व्यवस्था प्रभावी होगी?
तीसरा—क्या छत्तीसगढ़ के स्थानीय मुद्दों को भाजपा की राजनीतिक रणनीति में ज्यादा जगह मिलेगी?
चौथा—क्या प्रदेश संगठन विपक्ष के आरोपों का जवाब ज्यादा व्यवस्थित तरीके से देगा?
इन चार सवालों के जवाब ही इस नियुक्ति की वास्तविक दिशा तय करेंगे।
सिर्फ चेहरा नहीं, काम करने का तरीका मायने रखेगा
स्मृति ईरानी का नाम बड़ा है।
लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में सिर्फ बड़ा नाम पर्याप्त नहीं है।
यहां संगठन को स्थानीय नेतृत्व के साथ काम करना होगा। स्थानीय मुद्दों को समझना होगा। कार्यकर्ताओं की शिकायतें सुननी होंगी। सरकार की योजनाओं की वास्तविक जमीनी स्थिति समझनी होगी।
और सबसे महत्वपूर्ण—
दिल्ली से आया संदेश छत्तीसगढ़ के गांव तक और गांव की आवाज दिल्ली तक कितनी तेजी से पहुंचती है—यही असली परीक्षा होगी।
स्मृति ईरानी की नियुक्ति से आज छत्तीसगढ़ की सत्ता का गणित नहीं बदला है।
लेकिन भाजपा संगठन में एक नया अध्याय जरूर खुला है।
अब असली सवाल यह नहीं है कि स्मृति ईरानी कितनी बड़ी नेता हैं।
असली सवाल है—
क्या वह छत्तीसगढ़ भाजपा के संगठन को और ज्यादा जमीन से जोड़ पाएंगी?
क्योंकि प्रदेश प्रभारी की कुर्सी पर बैठना नियुक्ति है।
उस कुर्सी से संगठन को कितना मजबूत किया जाता है—वही असली अग्निपरीक्षा है।
सत्यधारा 24 | सच की धारा
