हार के बाद संगठन में बड़ा कद, क्या 2027 के यूपी चुनाव की जमीन तैयार कर रही है भाजपा?
सत्यधारा 24 | राजनीतिक विश्लेषण
नई दिल्ली। राजनीति में किसी नेता की वापसी महज नियुक्ति नहीं होती। खासकर तब, जब वह नेता लोकसभा चुनाव में हार के बाद राष्ट्रीय संगठन में पहले से ज्यादा बड़ी भूमिका के साथ लौटे। स्मृति ईरानी की भाजपा के राष्ट्रीय संगठन में वापसी इसी वजह से सामान्य फेरबदल से कहीं ज्यादा बड़ा राजनीतिक संकेत देती है।
भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन की नई टीम में स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय महामंत्री बनाया गया है। 2024 के लोकसभा चुनाव में अमेठी से कांग्रेस के किशोरी लाल शर्मा के हाथों हार के बाद ईरानी की यह वापसी बताती है कि भाजपा ने उन्हें राजनीतिक रूप से खत्म मानने की गलती नहीं की।
सवाल यह नहीं है कि स्मृति ईरानी वापस क्यों आईं। असली सवाल है—भाजपा को फिर उनकी जरूरत क्यों पड़ी?
अमेठी की हार भूली नहीं है भाजपा
2019 में स्मृति ईरानी ने अमेठी में राहुल गांधी को हराकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी सबसे बड़ी पहचान बनाई थी। लेकिन 2024 में वही अमेठी उनके हाथ से निकल गई।
यही विरोधाभास अब भाजपा की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
एक चुनाव में हार किसी नेता की राजनीतिक उपयोगिता खत्म नहीं करती। बल्कि भाजपा के लिए ईरानी की सबसे बड़ी पूंजी यही हो सकती है कि वह कांग्रेस के सबसे चर्चित राजनीतिक गढ़ में मुकाबला कर चुकी हैं और राहुल गांधी को हरा चुकी हैं।
अमेठी की हार ने उनकी कहानी खत्म नहीं की—बल्कि शायद पार्टी को उनकी अगली भूमिका के बारे में सोचने पर मजबूर किया।
2027 का यूपी—सबसे बड़ा कारण?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यही वह राज्य है जहां संगठन, जातीय समीकरण, महिला मतदाता, हिंदुत्व की राजनीति और विपक्षी गठजोड़—सभी एक साथ चुनावी तस्वीर बदल सकते हैं।
ऐसे समय में स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय महामंत्री बनाना केवल पद देना नहीं, बल्कि उन्हें फिर से मैदान में उतारने की तैयारी के तौर पर देखा जा सकता है।
रिपोर्टों के मुताबिक उनकी भूमिका को उत्तर प्रदेश और अमेठी-रायबरेली क्षेत्र में भाजपा की रणनीति से भी जोड़ा जा रहा है।
कांग्रेस के खिलाफ पुराना हथियार फिर धारदार?
स्मृति ईरानी की राजनीति की सबसे बड़ी पहचान उनकी आक्रामक शैली है।
कांग्रेस के खिलाफ बोलने वाले भाजपा नेताओं की कमी नहीं है, लेकिन ईरानी का राजनीतिक ब्रांड अलग है। वह संसद से लेकर चुनावी मंच तक कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को सीधे चुनौती देने के लिए जानी जाती रही हैं।
भाजपा शायद इसी राजनीतिक पूंजी को दोबारा इस्तेमाल करना चाहती है।
खासकर ऐसे समय में जब कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रही है, ईरानी को संगठन की अग्रिम पंक्ति में लाना कांग्रेस के लिए सीधा राजनीतिक संदेश भी है।
महिला नेतृत्व का भी संदेश
भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम में कई महिला नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई हैं और स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय महामंत्री का पद मिलना इस तस्वीर का सबसे चर्चित हिस्सा है।
इसका एक संदेश महिला मतदाताओं के लिए है।
भाजपा की राजनीति में महिला वोट बैंक लगातार महत्वपूर्ण हुआ है। ऐसे में ईरानी जैसा राष्ट्रीय चेहरा संगठन में सक्रिय करना पार्टी को महिला नेतृत्व की अपनी तस्वीर को मजबूत करने में मदद कर सकता है।
लेकिन यहां भी सवाल खड़ा होता है—
क्या यह सिर्फ प्रतिनिधित्व है या 2027 के लिए चुनावी निवेश?
संभवतः दोनों।
2024 की हार के बाद यह ‘री-लॉन्च’ क्यों?
स्मृति ईरानी की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती अब यही होगी कि 2024 की हार को अतीत बनाकर वह खुद को संगठन में कितना प्रभावी साबित करती हैं।
भाजपा ने उन्हें कोई सांत्वना पद नहीं दिया है।
राष्ट्रीय महामंत्री का पद संगठन में बेहद महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। इसका अर्थ है कि पार्टी उनसे केवल बयान देने की उम्मीद नहीं कर रही, बल्कि संगठन खड़ा करने, कार्यकर्ताओं को जोड़ने और चुनावी रणनीति को जमीन तक पहुंचाने की क्षमता भी चाहती है।
यानी यह कमबैक नहीं, टेस्ट भी है।
और यहीं से कहानी दिलचस्प होती है
स्मृति ईरानी की वापसी को अगर केवल “हार के बाद सम्मानजनक पुनर्वास” मान लिया जाए तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी।
भाजपा राजनीति में चेहरों का इस्तेमाल बहुत रणनीतिक तरीके से करती है।
एक तरफ राम माधव की वापसी हुई है, दूसरी तरफ वसुंधरा राजे जैसे अनुभवी नेताओं को नई जिम्मेदारियां मिली हैं। वहीं उत्तर प्रदेश को राष्ट्रीय टीम में भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिला है।
इस पूरी तस्वीर को जोड़कर देखें तो भाजपा सिर्फ नई टीम नहीं बना रही।
वह अगली राजनीतिक लड़ाइयों के लिए अपने पुराने हथियारों को भी फिर से धार दे रही है।
ईरानी के सामने सबसे बड़ी चुनौती
लेकिन भाजपा के लिए असली परीक्षा अब शुरू होगी।
सवाल यह नहीं कि स्मृति ईरानी कितनी लोकप्रिय हैं।
सवाल यह है कि क्या वह 2027 के यूपी चुनाव में पार्टी के संगठनात्मक लक्ष्य को जमीन पर बदल सकती हैं?
क्या वह कार्यकर्ताओं को एकजुट कर पाएंगी?
क्या अमेठी और रायबरेली जैसे कांग्रेस के प्रतीकात्मक क्षेत्रों में भाजपा का प्रभाव बढ़ा पाएंगी?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या 2024 की अमेठी हार को 2027 की राजनीतिक वापसी में बदला जा सकता है?
निष्कर्ष: भाजपा ने दरवाजा फिर खोला है, अब मैदान ईरानी का है
स्मृति ईरानी की वापसी को भाजपा की मजबूरी कहना शायद जल्दबाजी होगी।
लेकिन इसे रणनीतिक जरूरत जरूर कहा जा सकता है।
भाजपा को एक ऐसा चेहरा चाहिए जो राष्ट्रीय पहचान रखता हो, कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से सीधे मुकाबले का रिकॉर्ड रखता हो, उत्तर प्रदेश से राजनीतिक कनेक्शन रखता हो और महिला मतदाताओं के बीच अपनी अलग पहचान बना चुका हो।
ईरानी इन सभी कसौटियों पर फिट बैठती हैं।
लेकिन राजनीति में पुरानी जीत का ब्याज हमेशा नहीं मिलता।
2019 में राहुल गांधी को हराने वाली स्मृति ईरानी 2024 में अमेठी हार चुकी हैं।
अब भाजपा ने उन्हें फिर राष्ट्रीय मंच दिया है।
इसलिए अगली कहानी सिर्फ “स्मृति ईरानी की वापसी” की नहीं होगी।
कहानी यह होगी कि क्या भाजपा अपनी हारी हुई जमीन वापस लेने के लिए ईरानी को फिर से अपना ‘फ्रंटलाइन हथियार’ बना रही है?
और अगर 2027 में उत्तर प्रदेश का मुकाबला कांटे का हुआ—
तो स्मृति ईरानी की यह वापसी भाजपा की रणनीतिक मास्टरस्ट्रोक साबित होगी या 2024 की हार के बाद दूसरा बड़ा राजनीतिक इम्तिहान?
फैसला चुनाव करेगा।
