“गरीब के हक का चना सड़क पर कैसे पहुंचा? अब निगरानी तंत्र कटघरे में”
सुकमा। 15 अगस्त 2026।
सरकार गरीबों के लिए राशन भेजती है, विभाग उसकी निगरानी करता है और राशन दुकान के जरिए वह हितग्राही तक पहुंचना चाहिए। लेकिन सुकमा के गोलापल्ली इलाके में सरकारी चने की 15 बोरियां एक पिकअप वाहन के साथ जब्त होने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि चना कौन ले जा रहा था?

सवाल यह भी है कि सरकारी राशन सिस्टम से बाहर निकलकर यहां तक पहुंचा कैसे?
मामले में कार्रवाई करते हुए चना और वाहन जब्त किए गए हैं तथा आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत कार्रवाई की बात सामने आई है। लेकिन इस कार्रवाई के बाद जांच की असली दिशा अब राशन की निगरानी व्यवस्था की ओर भी होनी चाहिए।
चना बाहर निकला तो रिकॉर्ड में क्या हुआ?
यदि यह वही चना है जो सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत गरीब परिवारों के लिए आया था, तो जांच में यह पता लगाना बेहद जरूरी है कि संबंधित स्टॉक का रिकॉर्ड क्या कहता है।
कितना बांटा गया?
किस-किस हितग्राही को दिया गया?
कितना स्टॉक बचा था?
और फिर 15 बोरी चना पिकअप तक कैसे पहुंच गया?
इन सवालों के जवाब सिर्फ कागजों से नहीं, बल्कि मौके के भौतिक सत्यापन से भी सामने आने चाहिए।
विभागीय निरीक्षण पर भी सवाल
राशन दुकानों के निरीक्षण और स्टॉक सत्यापन की व्यवस्था होने के बावजूद यदि सरकारी खाद्यान्न संदिग्ध परिस्थितियों में बाहर मिलता है, तो यह जांच का विषय जरूर बनता है कि निरीक्षण वास्तव में कितना प्रभावी था।
क्या स्टॉक रजिस्टर और वास्तविक स्टॉक का मिलान हुआ था?
क्या ई-पॉस मशीन के रिकॉर्ड की जांच हुई?
क्या पिछले निरीक्षण में सब कुछ सामान्य पाया गया था?
अगर सब सामान्य था तो इतनी मात्रा में चना सिस्टम से बाहर कैसे आया?
और अगर रिकॉर्ड में अंतर था, तो उसे पहले क्यों नहीं पकड़ा गया?
सिर्फ ड्राइवर या वाहन तक जांच सीमित न रहे
इस मामले में यदि चना अवैध रूप से परिवहन किया जा रहा था, तो वाहन चालक या मौके पर मिले व्यक्ति पर कार्रवाई के साथ यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि माल आया कहां से और जाना कहां था।
यही जांच इस पूरे मामले की असली कड़ी खोल सकती है।
क्योंकि 15 बोरी चना अचानक सड़क पर पैदा नहीं हुआ। उसके पीछे आवंटन, स्टॉक, वितरण, उठाव और परिवहन की पूरी श्रृंखला होगी।
सुकमा में इससे पहले भी पीडीएस सामग्री के कथित अवैध भंडारण और कालाबाजारी से जुड़े मामले सामने आ चुके हैं। ऐसे में मौजूदा घटना के बाद केवल जब्ती और एफआईआर तक मामला सीमित रहने के बजाय यह देखना जरूरी है कि पिछली कार्रवाई के बाद व्यवस्था में क्या सुधार हुआ और अब भी ऐसी स्थिति क्यों बन रही है।
गरीब के राशन पर नजर किसकी?
सरकारी राशन की एक बोरी भी गरीब के अधिकार से जुड़ी है। इसलिए सवाल सिर्फ 15 बोरी चने का नहीं है।
सवाल उस सिस्टम का है, जिसकी निगरानी में सरकारी राशन बाहर निकल गया।
अब जरूरत है कि जांच यह तय करे कि गड़बड़ी केवल मौके पर पकड़े गए लोगों तक सीमित थी या इसके पीछे राशन वितरण श्रृंखला में कहीं और भी चूक हुई।
सत्यधारा 24 का सवाल:
अगर विभाग की निगरानी मजबूत थी, तो सरकारी चना पिकअप तक पहुंचा कैसे? और अगर निगरानी में चूक हुई, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है?
अब सिर्फ चना जब्त होने की खबर नहीं, जांच के नतीजे का इंतजार है।

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